इश्क़ हर जगह है!

frustrated husband
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इश्क़ हर जगह है!

इश्क़ हर तरफ छाया हुआ है किसी आसमान की तरह.
इश्क़ हर तरफ बिछा हुआ है किसी ज़मीन की तरह.
इश्क़ हर तरफ फैला हुआ है इन हवाओं की तरह.
बस उसे तलब है, तो एक आगोश की ! जो उसे भरले. एक हथेली की जो उसे थाम ले.

इश्क़ हर बात से ऊपर है. धर्म और जात से अनजान है.
घमंड और भेदभाव से कोसो दूर है इश्क़.

कही चाय की टपरी पर, गर्म प्याला है इश्क़. तो कही रिक्शा के शोर में गहन शांति है इश्क़.

चांदनी रात में, सर्द मौसम में
ठंड में ठरते हुए टेरिस पर
घंटो बात करा देता है इश्क़.
तो फोन की घंटी भी तो इश्क़ ही हो गयी ! इश्क़ वाली घंटी.
रात रात भर जाग के,जो आंखों के नीचे काले दाग आ जाते है, वोह भी इश्क़ ही है.
तुम्हे और मुझे जो लेजाती थी इस शहर से दूर, वोह सेकंडहैंड बाइक और ए चुप चापसी सड़क है इश्क़.

पिज़्ज़ा की जगह वो पांच रुपये की मुगफली और उसके साथ आता वो पेपर भी इश्क़ ही है.

गर्मी के मौसम में जब इंतज़ार तुम्हारा करता हु, तो पसीने छूट जाते है. कही किसीने रॉड पर सार्वजनिक मटका रखा है वो दिख जाता है. जो मुझे और मेरे गले को भिगो जाता है.
वो मटका,वो पानी और यह संतोष सब इश्क़ ही तो है.

फिर वक़्त गुजरता है बारीश आती है.
बादल सरेआम ज़मीन को चूम जाता है.
धरती भी कैसे महक ने लगती है,नही!

उस भीगी धरती की खुश्बू है इश्क़.
काले बादल की शरारत है इश्क़.
और पहले कभी भलेही ध्यान न दिया हो, पर अब यह भीनी मिट्टी की खुश्बू अच्छी लगती है!
इस अहेसास का होना है इश्क़.

यु करते कई और साल गुज़रजाते है.
ज़माने से बचते बचाते हम, कुछ और बड़े हो जाते है.
ये साथ बिताए साल है इश्क़.
उम्र के एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव की वह लकीर पार करना है इश्क़.

फिर शायद अलग होना पड़ता है.
दस्तूर ज़माने का,सरंखो पे रखना पड़ता है.
तुम्हे खोने का वह हिज़्र है इश्क़.
बिताये लम्हो को टटोल कर हँसना है इश्क़.
काले से सफेद होते इन बालोंके साथ, यादो का जवान रहना है इश्क़.

बदलते शहर की उन गालियो में आज देखते है, तो ढूंढते है पुराना ज़माना.
हमारा वह तहकीकात करना है इश्क़.

दफ्तर के बोरिंग आठ घंटे बिताके,जब घरको निकलते है.
तो फ्लायओवर पर वही दो-पहियों पे जाते कपल को देख,
मंद मंद मुस्कुराना है इश्क़.

तुम साथ हो या ना हो, महसूस तुम्हे करना हर वक़्त, यही है इश्क़.

हँसना, रोना, भागना, थमना और फिर वापस यही करना. ज़िंदा रहना सब बस इश्क़ ही तो है.

मंदिर के वो घंट जो जोर से बजते है. या फिर मज़्ज़ित के वह ब्युगल जो आयात सुनाते है. वह कहते है एक संदेशा, की इंसान एक ज़िंदा इश्क़ है.

तो कर इश्क़ और जी इश्क़.
क्योंकि हर जगाह है इश्क़.

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