मैं कविता कैसे लिखता हूं.

કોલેજ ના ગરબા
October 15, 2018

मैं
कविता कैसे लिखता हूं?

खिड़कियों पे एक चहेरा सजा हुआ होता हैं, उसका !

खिलती सुबह को वो देखते है,
और में उनको खिलता देखता हूं.

पंछियो की उड़ान देख वो मंद मंद हसते है,
उस हसी को में शब्द बना लेता हूं.

कुदरत को निहारते वो लुफ्त उठाते है,
में उस अहसास को चुरा लेता हूं.

चाय के प्याले जब लबों को छूते है उनके,
उस ताज़गी को कविता में समा लेता हूं.

ढलती शाम और उनके गालो पर टंगी लटो से,
जो अदाएं जलकती हैं,
उनको कविता का अंदाज़ बना देता हूं.

वो तकती रहती हैं,
भोर को निशा को खिड़की से, बस ऐसे ही में कविता बना लेता हूं.

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